महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना के लिए मंदिरों में पहुँचीं। सत्यनारायण मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर और बिलहरी बाँधा इमलाज मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लगी रही।
मंदिरों में भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी का श्वेत वस्त्रों से मनमोहक श्रृंगार किया गया। भोग स्वरूप मेवायुक्त और केसरयुक्त खीर अर्पित की गई, जिसे बाद में श्रद्धालुओं में प्रसाद रूप में वितरित किया गया। पूरे दिन मंदिर परिसर भक्ति गीतों और जयकारों से गूंजता रहा।
पंडितों के अनुसार, शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे विशेष पूर्णिमा माना जाता है। इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है। मान्यता है कि चाँदनी रात में खीर रखी जाती है तो वह औषधीय गुणों से भर जाती है, जिसे अगली सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
व्रत और पूजन के दौरान महिलाओं ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। पूजा में शामिल श्रद्धालुओं ने कहा कि शरद पूर्णिमा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह ऋतुओं के परिवर्तन और नई ऊर्जा की शुरुआत का भी प्रतीक है।
कटनी में इस अवसर पर जगह-जगह धार्मिक आयोजन हुए। मंदिरों की सजावट और दीपमालाओं ने पूरा वातावरण दैवीय आलोक से भर दिया। चाँदनी रात में खीर की मिठास और भक्ति के सुरों ने शरद पूर्णिमा की इस रात को सचमुच अमृतमयी बना दिया।